लहलहाती फसल दूर तक गोधुलि सन्नाटा सहसा टिटहरी बोल जाती है, वहीं पुराने बरगद के नीचे हर बैठने वाले को वही पुरानी नदी बुलाती है, मौन होता है एकमात्र उपाय शब्द विश्राम करते हैं जब प्रकृति गुदगुदाती है, अनजाने में ही आत्मसात् हो जाते हैं कुछ दृश्य कुछ दृश्य आँखें नहीं देख पाती हैं, बिना बताए प्रकृति जेब में रख देती है विदाई बेलों की गंध टिकोरी की सुगंध आती है! -©अरुण तिवारी
Arun Tiwari
Poet & Writer