जैसे सह लेता है पतझड़ में वृक्ष आखिरी पछी की उड़ान बसंत चढ़ने से पहले ठीक ही है कि सूख कर गिर ही जाएँ कुछ संबंध बहुत कुछ सहने से पहले अकेले ही बीतें कुछ वर्ष बहुत दिन मौन रह जाएँ बहुत कुछ कहने से पहले सूने खोंते रीते हाथ बुरे दिन दिख ही जाएँ भीड़ बढ़ने से पहले टुटे हौंसला शुन्य मनोबल घिरे अवसाद मृत्यु के विकल्प पर भी करना पड़ जाए विचार जीते रहने से पहले जैसे अकेले पड़ जाता है पतझड़ में वृक्ष मरणासन्न झेलता है अस्तित्व का संकट बसंत चढ़ने से पहले। -© अरुण तिवारी
Poet & Writer