हाँ, ये बात तो सच है वो सुनता तो है मेरी, तो वृक्षों के लिए कहूँगा कोयल के लिए कहूँगा कहूँगा नदियों पहाड़ों के लिए खिले गुलाब गुलज़ारों के लिए दूब के लिए डाली के लिए मोरम की लाली के लिए झींगुर के लिए जुगुनू के लिए सागौन गुलमोहर के लिए और न कहूँ तो मौन सही लेकिन प्रार्थना करूँ हमारे लिए नहीं नहीं, बिल्कुल नहीं! हम इस लायक नहीं हैं हम घुन बन चुके हैं साथ रहकर एक दूसरे का अस्तित्व चाट जाते हैं। -©अरुण तिवारी
Poet & Writer