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Showing posts from February, 2017

!! एक संदेश !!

मेरी कविता "एक संदेश" पर एक बच्ची का नृत्योभिनय। तुमने जो मेरी साँसों में चिमनी की धुंध भरी है, घुटती हूँ मैं नित ही उसमें पीड़ा भी अति गहरी है, यदि पुत्र तुम्हें कृत्रिम बागों में साँस न कल दे पाऊँ, तो हे विकास के अनुगामी तुम दोष मुझे मत देना। हरे भरे कानन लुटा दिए कॉनक्रीट की हस्ती पर, भव्य भवन जो चमक रहे ये चढ़ दरख्त की अर्थी पर, इन स्मार्ट शहर के नल से यदि इक बूँद गिरा ना पाऊँ, तो हे विकास के अनुगामी तुम दोष मुझे मत देना। अब जहाँ कूँजते थे खग कलरव शोर हुआ सैलाबी, सरसों के पीले फूलों पर हैं राजमार्ग अब हाबी, ताल तलैया नदियाँ नहरें सूख गईं बरसातों में, खेतों खलिहानों की महता सिमट गई बस बातों में, यदि बंजर होकर एक अन्न भी खिला तुम्हें ना पाऊँ, तो हे विकास के अनुगामी तुम दोष मुझे मत देना। मृगशावक मृगपतियों से था गजराजों से भरा-भरा, उधड़ गईं उनकी खालें वन सूखा सूना मरा-मरा, अस्तित्व युद्ध में साथ तुम्हारा दे न अगर मैं पाऊँ, तो हे विकास के अनुगामी तुम दोष मुझे मत देना। उस भ्रूण में कोई नहीं मरा बस मरा पुण्य का तेज, और सृजन चक्र का वेग मर गया सजी पाप क...

!! उर प्रेरणा बन स्फुटित !!

उर प्रेरणा बन स्फुटित होता है जो वो कौन है? सिद्ध है की लिप्त है अंदर कहीं तो बंद है, जो निरंतर छेड़ता मन छेड़ता हर छंद है, बीज अंदर स्वप्न के बोता है जो वो कौन है? उर प्रेरणा बन स्फुटित होता है जो वो कौन है? बना प्रतिबिंब कल का कल्पनाओं के पटल पर हो, जाता है ओझल छाप जिसकी है अटल पर चेतना भरता भी व हरता है जो वो कौन है? उर प्रेरणा बन स्फुटित होता है जो वो कौन है? व देख कर वो जो हमारी दृष्टि से इस सृष्टि को व धूप छू कर जो हमारी ही त्वचा से वृष्टि को, झूमता अंदर कहीं गाता है जो वो कौन है? उर प्रेरणा बन स्फुटित होता है जो वो कौन है? जो भरता है मन भावों से जो रचता प्रणय को, बना देता है जो क्रोधित द्रवित निष्ठुर ह्रदय को, अश्रु सहसा क्लेश सब धोता है जो वो कौन है उर प्रेरणा बन स्फुटित होता है जो वो कौन है? कौन है जो अचानक आस भर देता है मन में, शिथिलता तोड़ सारी जान भर देता है तन में, जब कदम रूकता उठा देता है जो वो कौन है? उर प्रेरणा बन स्फुटित होता है जो वो कौन है? कौन कहता है चलो तुम धुन में मेरी तुम बहो? हम तो समझे तुम मुरारी तुम नहीं तो तुम कहो तुम बताओ शक्ति दे जाता है जो वो कौन है? उ...

!! दीर्घकालिक षड्यंत्र !!

कौओं की आँखों से बचके उसने अपना नीड़ बनाया चूजों के स्वागत के लिए। रखी जाने लगी नज़र चिड़िया दो दो उनके बच्चे चुन लिए गए दावत के लिए। बेबस गाँव हताशे पाँव परीक्षा शुल्क के लिए चुन लिए गए आमद के लिए। लीक हुई उत्तर पुस्तिका दीर्घकालिक षड्यंत्र कवि के अदावत के लिए कमर कस ली गई बग़ावत के लिए। -©अरुण तिवारी