कौआ लगे सुरीला सबको कौआ सबको भाए, कोयल दुबकी कहीं पेड़ में कौआ कथा सुनाए, उच्चासन पर माइक थामें कागभुशुण्डि खुद को मान, कौआ बोला काँव काँव काँव काँव काँव काँव। हाय कौए की काली काली आँखें कितनी सुंदर, पाँखें सुंदर काली काली कहता फिरे छछूंदर, सबको पापी धूर्त बताने खुद फुनगी पर बैठ, कौआ बोला काँव काँव काँव काँव काँव काँव। काँव काँव पर ढोल पीटकर देते हैं सब दाद, चेले चपाड़ी घेरे रहते कहते वाह उस्ताद, रट्टू तोते सुनने बैठे कुत्ते पूँछ हिलाते, कौआ बोला काँव काँव काँव काँव काँव काँव। जितने तन के उजले सबका कहलाता है द्योतक, राजमहल तक पहुँच हो गई कहलाता परितोषक, अभी अभी जो पाया उसने उस वैभव में झूम, कौआ बोला काँव काँव काँव काँव काँव काँव। कौआ काटे उनको जो हैं सच कहने के आदी, खलल डालने नींद में उसके आते जो फ़रियादी, जो झूठ बोलने वाले हैं अब माथा उनका चूम, कौआ बोला काँव काँव काँव काँव काँव काँव। -©अरुण तिवारी
Poet & Writer