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महीने भर बाद
गमले के पास
फिर आई थी कबूतरी
चंचल होते हैं परिंदे
किंतु वो खामोश थी
दिन भर बैठी रही
वहीं बैठी रही
जहाँ उसके चूज़े
करते थे चीं चीं
जहाँ से उसके चूज़ों को
चोंच में दबोचकर
उड़ गया था कौआ।
- © अरुण तिवारी
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