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!! मुंबई के बच्चे !!

कल्पना कैसे करें वे
जो दृश्य देखे ही नहीं
बच्चे ने कहा कि सच्ची बोलो
सच्ची सच्ची बोलो
क्या सच में अपने हाँथ से
तोड़कर खा सकते हैं आम?
कहते वक्त उसकी आँखों में
चमक आ गई थी
खिल गया था उसका चेहरा
नहीं यार! सच्ची सच्ची बोलो
ऐसा भी होता है क्या?

उसे देख मैं सोच रहा था
कि नहीं दिखाना
गाँव शहर के बच्चों को
नहीं चलाना
कच्ची पगडंडी पर
नंगे पाँव शहर के बच्चों को
है महाघोर अन्याय
महाघोर अन्याय
इन मासूमों के प्रति!

बिखरे महुए पेड़ के नीचे
खेत मेंड़ खलिहान बगीचे
तीसी मसुरी सरसो पीले
खेतों के कीचड़ गीले गीले
नदी नार में कूद नहाना
छपक छपक हुड़दंग मचाना
पेड़ में लदे लदे से आम
जामुन के खातिर कोहराम
कोपर के खातिर ढेलम ढेला
धक्कम धक्का ठेलम ठेला
बैर मकोय इमली धूल
बरगद पीपल और बबूल
लाल हुई पक करके साढ़ी
मेंटी में बैठाए दूध
ओरी के नीचे वर्षा में
उग आती है जो दूब
नहीं दिखाना इन आँखों को
महाक्रूरता है इनके प्रति!

चना खोंटकर बुकनी के संग
होरहा इनको नहीं चखाना
और खेत से तोड़ सामने
भुट्टे भुनकर नहीं खिलाना
खेतों से खेतों में बहते
पानी झरझर नहीं सुनाना
महाक्रूरता है इनके प्रति!
महाक्रूरता है इनके प्रति!

-©अरुण तिवारी